हल्दीघाटी का युद्ध कब और किसके बीच हुआ पूरी जानकारी

आज हम जानेंगे कि हल्दीघाटी का युद्ध कब (haldighati ka yuddh)और किसके बीच हुआ | हल्दीघाटी यूद्ध में कौन जीता था | हल्दीघाटी कौन से जिले में है-

5000 चुने हुए सैनिकों को लेकर मानसिंह शक्तिसिंह शहजादे सलीम के साथ 3 अप्रैल, 1576 ई. को मंडलगढ़ जा पहुंचे. शहजादा सलीम इस सेना का सेनापति था, परन्तु आक्रमण का पूरा सेहरा मानसिंह के सर पर था. सब जानते थे की ये आक्रमण मानसिंह के पहल में ही हो रहा है. 

इस सेना में मुग़ल सेना की चुनी हुई हस्तियाँ मानसिंह के साथ में थी- गाजी खां, बादक्शी,ल ख्वाजा गियासुद्दीन, आसफ खां आदि को साथ लेकर मानसिंह ने दो माह तक मांडलगढ़ में मुग़ल सेना का इन्तेजार किया. 

मानसिंह मेवाड़ पर आक्रमण

महाराणा प्रताप को जब यह पता लगा की शक्तिसिंह को साथ लेकर मानसिंह मेवाड़ पर आक्रमण के लिए चल पड़ा है, और मंडलगढ़ में रूककर एक बड़ी मुग़ल सेना का इन्तेजार कर रहा है, तो महाराणा प्रताप ने उसे मंडलगढ़ में ही दबोचने का मन बना लिया, परन्तु अपने विश्वसनीय सलाहकार रामशाह तोमर की सलाह पर राणा प्रताप ने इरादा बदल दिया. 

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हल्दीघाटी का युद्ध

हल्दीघाटी का युद्ध (haldighati ka yuddh) कब और किसके बीच हुआ ?

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच लड़ा गया

हल्दीघाटी कौन से जिले में है ?

 हल्दीघाटी राजस्थान राज्य के मेवाड़ (उदयपुर) अंचल के राजसमन्द जिले में स्थित है.

कुम्भलगढ़ की पहाड़ियों

रणनीति बनाई गयी की मुगलों को पहल करने देनी चाहिए और उस पर कुम्भलगढ़ की पहाड़ियों से ही जवाबी हमला किया जाए. अपनी फ़ौज की घेरा को मजबूत करने के लिए महाराणा प्रताप कुम्भलगढ़ से गोगुंडा पहुंचे.

उनके साथ उस समय झालामान,झाला बीदा, डोडिया भीम, चुण्डावत किशन सिंह, रामदास राठोड, रामशाह तोमर, भामाशाह व् हाकिम खां सूर आदि चुने हुए व्यक्ति थे. 

जून के महीने में बरसात के आरम्भ में मुगल सेना ने मेवाड़ के नै राजधानी कुम्भलगढ़ के चरों ओर फैली पर्वतीय श्रृंखलाओं को घेर लिया. कुम्भलगढ़ प्रताप का सुविशाल किला था, जो की प्रताप की समस्त गतिविधियों का केंद्र था. 

इसी जगह प्रताप का जन्म हुआ था और कहा जाता है की विश्व में चीन की दिवार के बाद सबसे लम्बी दीवारों में से एक है. मानसिंह तथा मुग़ल शहजादा ने सारी जानकारी प्राप्त कर यह रणनीति तैयार की कि प्रताप को चारो ओर से घेर कर उस तक रसद पहुँचने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाए. 

कुम्भलगढ़ के बुर्ज से महाराणा प्रताप ने जब मुग़ल सेना और उसकी घेराबंदी का निरिक्षण किया तब वे समझ गए की राजपूतों के अग्निपरीक्षा के दिन आ गए है. 

कुम्भलगढ़ मे प्रवेश

जहाँ भी नजर जाते थी बरसाती बादलों के तरह फैले मुग़ल सेना के तम्बू नजर आ रहे थे. मुग़ल सेना का घेरा बहुत मजबूत था, इतना मजबूत था की उससे नजर बचाकर परिंदा भी कुम्भलगढ़ मे प्रवेश नहीं कर सकता था. मुग़ल सेना में अधिक संख्या भीलों और नौसीखिए की थी. 

तीर कमान, बरछी, भाले, और तलवारे ही उनके हथियार थे. मुग़ल सेना के पास तोपें थे और अचूक निशाना लगाने वाले युद्ध पारंगत तोपची थे. महाराणा प्रताप के पास एक भी टॉप नहीं थी पर उनका एक एक सैनिक अपना सर में कफ़न बंधकर निकला था, जान लेने और जान देने का जूनून प्रताप के हर सैनिक में था. 

मुग़ल सेना के निरिक्षण

मुग़ल सेना के निरिक्षण के बाद महाराणा प्रताप अपने प्रमुख सलाहकारों एवं सरदारों के साथ अपनी सेना के सम्मुख पहुंचे. और सैनिकों को सम्भोधित करते हुए कहा –“जान लेने और जान देने का उत्सव अब हमारे सिर में है, मुग़ल सेना काले घटाओं की तरह कुमलमेर की पहाड़ियों पर छा गयी है

एक लाख से अधिक मुग़ल सेना ने हमें इस आश को लेकर घेरा है की हम संख्या में कम है और विस्तार देख कर ही डर जायेंगे, परन्तु शायद वो भूल गए है की सूर्य की एक मात्र किरण अत्यंत अन्धकार को विदीर्ण करने के लिए काफी होती है. 

मुग़ल सेना का सेनापति भावी मुग़ल सम्राट शहजादा सलीम कर रहा है, और उसका मार्गदर्शन कर रहे है देश के दो गद्दार राजपूत मानसिंह और शक्तिसिंह. मानसिंह वो गद्दार है जिसने अपनी बहन को शहजादे सलीम से ब्याह दी और शक्तिसिंह इस मेवाड़ धरती का गद्दार है

जो की दुर्भाग्यवश मेरा भाई है, उसे भाई कहते हुए मुझे लज्जा आती है, परन्तु यह सच है की आज उसने राजपूती शान का बट्टा लगाया है, वह मुग़ल सेना के साथ मिलकर अपनी ही धरती और अपने ही भाई में चढ़ाई करने आया है. 

शक्ति सिंह इस जगह से भली भांति परिचित है. वह घर का भेदी है, अगर आज वो उनके साथ नहीं होता तो हमारे बहुत से रहस्य शत्रुपक्ष को पता नहीं लग पाते, और उस स्थिति का लाभ उठा कर हम शत्रु पक्ष को अनेक तरह से पटखनी दे सकते थे. 

मेवाड़ धरती

परन्तु ये हमारे मेवाड़ धरती का दुर्भाग्य है की उसी का एक बेटा विदेशी मुग़ल सेना को लेकर उसी की मनंग उजाड़ने आया है.परन्तु साथियों विजय सिर्फ हमारी होगी क्योंकि ये हमारी स्वाधीनता बचाने की लड़ाई है, और हम अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना खून बहाना भलीं भांति जानते है.

हम गिन गिन कर शत्रुओं का सिर काटेंगे. हमारे एक एक सैनिकों को पच्चीस पच्चीस मुग़ल सैनिकों का सर काटना है. 

हमारा हौसला बुलंद हो, हमारी भुजाओं की ताकत के सामने, हमारे, युद्ध कौशल, व् देशभक्ति के जूनून के सामने एक भी शत्रु सैनिक यहाँ से जीवित बचकर नहीं जा पायेगा. हम एक एक को कुमाल्मेर की पहाड़ियों में दफ़न कर देंगे. 

आओ प्रतिज्ञा करें की हम एक एक सैनिकों को मुगलों के पच्चीस पच्चीस सैनिकों के सिर काटने है, हमारे जीते जी शत्रु हमारी मातृभूमि पर कदम नहीं रख सकेगा, इसके लिए चाहे हमें कोई भी कीमत चुकाने पड़े. 

हम इन मुग़ल सेना को बता देंगे की हम भले ही मर जाये पर युद्ध भूमि से पिछे हटना हम राजपूतों के खून में नहीं है. इसप्रकार से महाराणा प्रताप की जोरदार आवाज से सैनिकों में प्रोत्साहन भरा जाने लगा, उनके इस बातों को सुनकर उनके सैनिकों का मनोबल आसमान की उचाईयों में पहुंचा दिया. 

सबने जोरदार अपने तलवारे खिंची और और बुलंद आवाज में घोषणा की कि अब ये तलवार शत्रु का रक्त पी कर ही म्यान में वापस जाएगी. 

युद्धनिति (haldighati ka yuddh)

दोनों ओर की सेना तैयार हो गयी परन्तु हमला नहीं हुआ, महाराणा प्रताप ने मन बना लिया था की पहले मुग़ल सेना पहल करेगी और उसके हमला करते ही हमारी सेना उनपर टूट पड़ेगी परंतू मान सिंह ने यह युद्धनिति तैयार की थी की मुग़ल सेना सीधे हमला कर पहाड़ियों के बीच में नहीं फसेंगी, वो उनको बस कुछ दिन घेरे रखेंगे ताकि उनका रसद उनतक ना पहुँच सके और महाराणा प्रताप की सेना पहाड़ियों से उतरकर खुले मैदान में आ सके

जिससे उन्हें हराना ज्यादा आसान हो जाये. शहजादा इस पक्ष में था की आगे बढ़कर उनपर आक्रमण किया जाये ताकि युद्ध जल्दी ख़त्म हो सके. 

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