Jagjit Singh Ghazal List 2021 | जगजीत सिंह ग़ज़ल लिस्ट

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Jagjit Singh Ghazal List
Jagjit Singh Ghazal List

प्यार का पहला

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है,

नये परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है.

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,

लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है.

गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी,

लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है.

हमने इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो ढूँढ़ लिया है,

गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।

मय पिलाकर

मय पिलाकर आपका क्या जाएगा,

जाएगा ईमान जिसका जायेगा,

देखकर मुझको वो शरमा जाएगा,

ये तमाशा किससे देखा जायेगा.

जाऊं बुतखाने से क्यूँ काबे को मैं,

हाथ से ये भी ठिकाना जाएगा,

क़त्ल की जब उसने दी धमकी मुझे,

कह दिया मैंने कि देखा जायेगा.

पी भी ले दो घूँट ज़ाहिद पी भी ले,

मयकदे से कौन प्यासा जायेगा.

फूल खिला दे शाखों पर

फूल खिला दे शाखों पर, पेड़ों को फल दे मालिक,

धरती जितनी प्यासी है, उतना तो जल दे मालिक

वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत,

निर्धन को धनवान बना, दुर्बल को बल दे मालिक

कोहरा कोहरा सर्दी है, काँप रहा है पूरा गाँव,

दिन को तपता सूरज दे, रात को कम्बल दे मालिक

बैलों को एक गठरी घास, इंसानों को दो रोटी,

खेतों को भर गेहूं से, कांधों को हल दे मालिक

हाथ सभी के काले हैं, नजरें सबकी पीली हैं,

सीना ढांप दुपट्टे से, सर को आँचल दे मालिक

वस्ल की रात

वस्ल की रात तो राहत से बसर होने दो,

शाम से ही है ये धमकी के सहर होने दो

जिसने ये दर्द दिया है वो दवा भी देगा,

नादवा है जो मेरा दर्द-ए-जिगर होने दो

ज़िक्र रुख़सत का अभी से न करो बैठो भी,

जान-ए-मन रात गुज़रने दो सहर होने दो

वस्ल-ए-दुश्मन की ख़बर मुझसे अभी कुछ ना कहो,

ठहरो-ठहरो मुझे अपनी तो ख़बर होने दो.

किया है प्यार

किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह

वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह

किसे खबर थी बढ़ेगी कुछ और तारिकी

छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह

बढ़ा के प्यास मेरी उसने हाथ छोड़ दिया

वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह

सितम तो ये है कि वो भी ना बन सका अपना

कुबूल हमने किये जिसके ग़म खुशी की तरह

कभी ना सोचा था हमने क़तील उस के लिए

करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह

भूल जाऊं तुम्हें

मैं भूल जाऊं तुम्हें

अब यही मुनासिब है

मगर भुलाना भी चाहूं

तो किस तरह भूलूं

कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो

कोई ख़्वाब नहीं

यहां तो दिल का ये आलम है

क्या कहूं…

कम्बख़्त

भुला सका ना ये वो सिलसिला जो था ही नहीं

वो इक ख़याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं

वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुमसे

वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं

मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं

अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए

तुम्हें भुलाना भी चाहूं तो किस तरह भूलूं

कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं

शख्स मसीहा

तुमने सूली पे लटकते जिसे देखा होगा,

वक़्त आएगा वही शख्स मसीहा होगा,

ख्वाब देखा था कि सेहरा में बसेरा होगा,

क्या ख़बर थी कि यही ख्वाब तो सच्चा होगा,

मैं फ़िज़ाओं में बिखर जाऊंगा खुशबू बनकर,

रंग होगा न बदन होगा न चेहरा होगा

सच्ची बात

सच्ची बात कही थी मैंने,

लोगों ने सूली पे चढाया,

मुझ को ज़हर का जाम पिलाया,

फिर भी उनको चैन न आया,

सच्ची बात कही थी मैंने,

ले के जहाँ भी वक्त गया है,

ज़ुल्म मिला है, ज़ुल्म सहा है,

सच का ये इनाम मिला है,

सच्ची बात कही थी मैंने,

सब से बेहतर कभी न बनना,

जग के रहबर कभी न बनना,

पीर पयम्बर कभी न बनना,

चुप रह कर ही वक्त गुजारो,

सच कहने पे जान मत वारो,

कुछ तो सीखो मुझ से यारों,

सच्ची बात कही थी मैंने

तेरे दामन में

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं,

तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं,

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो,

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं,

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ,

सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं,

या खुदा अबके ये किस रंग में आई है बहार,

ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं,

दिल भी एक जिद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह,

या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं,

बेनाम सा ये दर्द

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीँ जाता

जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता

सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती है निगाहेँ

क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यूँ नहीं जाता

वो एक ही चेहरा तो नहीँ सारे जहाँ में

जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा

जाते है जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता

वो नाम जो बरसों से ना चेहरा ना बदन है

वो ख्वाब नगर है तो बिखर क्यूँ नहीं जाता

Jagjit Singh Ghazal List

मुझसे ख़फ़ा है

आँख से आँख मिला बात बनाता क्यूँ है

तू अगर मुझसे ख़फ़ा है तो छुपाता क्यूँ है

ग़ैर लगता है न अपनों की तरह मिलता है

तू ज़माने की तरह मुझको सताता क्यूँ है

वक़्त के साथ हालात बदल जाते हैं

ये हक़ीक़त है मगर मुझको सुनाता क्यूँ है

एक मुद्दत से जहां काफ़िले गुज़रे ही नहीं

ऐसी राहों पे चराग़ों को जलाता क्यूँ है

दिनों की बात

बहुत दिनों की बात है

फिज़ा को याद भी नहीं

ये बात आज की नहीं

बहुत दिनों की बात है

शबाब पर बहार थी

फिज़ा भी ख़ुशगवार थी

ना जाने क्यूँ मचल पड़ा

मैं अपने घर से चल पड़ा

किसी ने मुझको रोक कर

बड़ी अदा से टोक कर

कहा था लौट आईये

मेरी क़सम ना जाईये

पर मुझे ख़बर न थी

माहौल पर नज़र न थी

ना जाने क्यूँ मचल पड़ा

मैं अपने घर से चल पड़ा

मैं शहर से फिर आ गया

ख़याल था कि पा गया

उसे जो मुझसे दूर थी

मगर मेरी ज़रूर थी

और एक हसीन शाम को

मैं चल पड़ा सलाम को

गली का रंग देख कर

नई तरंग देख कर

मुझे बड़ी ख़ुशी हुई

मैं कुछ इसी ख़ुशी में था

किसी ने झांक कर कहा

पराये घर से जाईये

मेरी क़सम न आईये

वही हसीन शाम है

बहार जिसका नाम है

चला हूँ घर को छोड़ कर

न जाने जाऊँगा किधर

कोई नहीं जो टोक कर

कोई नहीं जो रोक कर

कहे कि लौट आईये

मेरी क़सम न जाईये

आँखों के समंदर

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे

तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे

ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना

पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी

कोई आँसू मेरे दामन पर बिखर जाने दे

ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको

सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे

होंठों पर सजाना

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ

आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर

बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

थक गया मैं करते-करते याद तुझको

अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा

रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये

मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

रोया परदेस

मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार,

दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार,

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार,

आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार,

लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव,

हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव,

सबकी पूजा एक सी, अलग-अलग हर रीत,

मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत,

पूजा घर में मूर्ति, मीरा के संग श्याम,

जिसकी जितनी चाकरी, उतने उसके दाम,

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर,

जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फ़कीर,

अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप,

जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप,

सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास,

पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास,

चाहे गीता बांचिये या पढ़िए क़ुरान,

मेरा तेरा प्यार ही, हर पुस्तक का ज्ञान

सोचा नहीं अच्छा बुरा

सोचा नहीं अच्छा बुरा, देखा सुना कुछ भी नहीं

मांगा ख़ुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं

सोचा तुझे, देखा तुझे, चाहा तुझे पूजा तुझे

मेरी वफ़ा मेरी ख़ता, तेरी ख़ता कुछ भी नहीं

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर

भेजा वही काग़ज़ उसे, हमने लिखा कुछ भी नहीं

इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक

आँखों से की बातें बहुत, मुँह से कहा कुछ भी नहीं

दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा

जब आग पर काग़ज़ रखा, बाकी बचा कुछ भी नहीं

अहसास की ख़ुशबू कहाँ, आवाज़ के जुगनू कहाँ

ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं

दुनिया में इंक़लाब

हुस्न पर जब कभी शबाब आया

सारी दुनिया में इंक़लाब आया

मेरा ख़त ही जो तूने लौटाया

लोग समझे तेरा जवाब आया

उम्र तिफली में जब ये आलम है

मार डालोगे जब शबाब आया

तेरी महफ़िल में सुकून मिलता है

इसलिए मैं भी बार बार आया

तू गुज़ारेगी ज़िंदगी कैसे

सोच कर फिर से मैं चला आया

ग़म की निस्बत न पूछिए हमसे

अपने हिस्से में बेहिसाब आया

मस्जिद की तरफ़

घर से हम निकले थे मस्जिद की तरफ़ जाने को,

रिंद बहका के हमें ले गये मैख़ाने को,

ये ज़बां चलती है, नासेह के छुरी चलती है,

ज़ेबा करने मुझे आये है के समझाने को,

आज कुछ और भी पी लूं के सुना है मैने,

आते हैं हज़रत-ए-वाइज़ मेरे समझाने को,

हट गई आरिज़-ए-रोशन से तुम्हारे जो नक़ाब,

रात भर शम्मा से नफ़रत रही दीवाने को.

चराग़-ए-इश्क़

चराग़-ए-इश्क़ जलाने की रात आई है,

किसी को अपना बनाने की रात आई है,

फ़लक का चांद भी शरमा के मुंह छुपाएगा,

नक़ाब रुख़ से हटाने की रात आई है,

निग़ाह-ए-साक़ी से पैहम छलक रही है शराब,

पियो के पीने पिलाने की रात आई है,

वो आज आये हैं महफ़िल में चांदनी लेकर,

के रौशनी में नहाने की रात आई है

दिन गुज़र गया

दिन गुज़र गया ऐतबार में

रात कट गयी इंतज़ार में

वो मज़ा कहाँ वस्ल-ए-यार में

लुत्फ़ जो मिला इंतज़ार में

उनकी इक नज़र काम कर गयी

होश अब कहाँ होशियार में

मेरे कब्ज़े में आईना तो है

मैं हूँ आपके इख्तेयार में

आँख तो उठी फूल की तरफ

दिल उलझ गया हुस्न-हार में

तुमसे क्या कहें, कितने ग़म सहे

हमने बेवफ़ा तेरे प्यार में

फ़िक्र-ए-आशियां हर खिज़ाम की

आशियां जला हर बहार में

किस तरह ये ग़म भूल जाएं हम

वो जुदा हुआ इश्तिहार में

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