कबीरदास का जीवन परिचय | Kabir Das ka Jivan Parichay

आज हम जानेगें हिंदी के महान कवि Kabir Das ka Jivan Parichay के बारे में, कि कबीरदास का जन्म कहा हुआ. कबीरदास का जीवन कैसा था कबीर दास ने अपने जीवन में क्या-क्या काम किये. अगर नहीं जानते तो इस पोस्ट में आपको कबीरदास के बारे में पूरी जानकारी मिलेगी अगर आप कबीर दास के बारे में सब कुछ जाना चाहते हो तो इस पोस्ट को लास्ट तक पढ़े

Kabir Das ka Jivan Parichay
kabir das ka jivan parichay

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कबीरदास का जीवन परिचय (Kabir Das ka Jivan Parichay)

कबीर हिंदी साहित्य की निर्गुण भक्तिधारा के परमुख संत कवि थे संत काव्यधारा के वह प्रतिनिधि कवि माने जाते है कबीर के जन्म के विषय मे अधिकांश विद्वान इनका जन्म सम्वत 1455 और देहांत 1575 स्वीकार करते है इनका जनम स्थान काशी था जनस्रुति के अनुसार कबीर काशी के लहरतारा नामक तालाब के किनारे निरु और नीमा नामक जुलाहा दम्पति को मिले और उन्होंने इस नवजात शिशु को पाल-पोश क्र बढ़ा किया कहा जाता है की कबीर विवाहित थे और उनका एक पुत्र और एक पुत्री थी

कबीर के गुरु रामानंद थे और गुरु में उनकी अगाध आस्था थी उनकी शिक्षा-दीक्षा के विषय में किसी प्रकार की जानकारी उपलब्ध नहीं है वह अपने अनुभव को ही अपनी वाणी द्वारा सम्प्रेक्षित करते है

कबीर दास के बारे में जाने

कबीरदास का पूरा नाम संत कबीरदास
संत कबीर का अन्य नाम कबीरा
कबीरदास का जन्म संवत 1398
कबीर दास की जन्म भूमि काशी, लहरतारा
मृत्यु संवत 1518
माता और पिता का नाम नीरू और नीमा
पत्नी का नाम लोई
पुत्र का नाम कमाल
पुत्री का नाम कमाली
कबीर दास प्रोफेशनसमाज सुधारक, कवि
कबीरदास की मुख्य रचनाएँ साखी, सबद और रमैनी
कबीरदास नागरिकता भारतीय
कबीरदास की शिक्षा निरक्षर
कबीरदास की भाषा अवधि, पंचमेल खिचड़ी और सधुक्क्ड़ी
कबीरदास की क्रम भूमि काशी और बनारस

कबीर दास जी का जीवन परिचय और उनकी रचनाएँ?

कबीर की कृतियों को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा कबीर की 150 कृतियाँ बतलाई जाती है कुछ विद्वानों ने जिन आठ रचनाओं का उल्लेख किया है, उनके नाम इस प्रकार है-

  1. आनंद रामसागर
  2. वलख की रमैनी
  3. चांचरा
  4. हिंडोला
  5. झूलना
  6. कबीर पंजी
  7. कहरा
  8. शब्दावली

कबीर के प्रमाणिक और प्रकासित संग्रह इस प्रकार है-

  1. कबीर वचनावली जिनके संपादक आयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिओध’ है
  2. कबीरदास ग्रंथावली जिनके संपादक श्यामसुन्दरदास है
  3. तीसरी कृति भी कबीर ग्रंथावली है जिसके पारसनाथ तिवारी ने सम्पादित किया है

कबीर ग्रंथावलीयो में कबीर द्वारा कही गई वाणियो के तीन भाग है- साखी, सबद और रमैनी | कबीर ने अपनी सखियों को अंगो में विभाजित किया है, यथा- गुरुदेव को अंग, सुमिरन के अंग, विरह को अंग, ग्यान को अंग, माया को अंग इत्यादि | इनकी सखिया अत्यंत महत्वपूर्ण है इनमे प्रत्यक्ष घटनाओ और अनुभूतियो को अभिव्यक्त किया जाता है इस से यह साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत होती है सखिया अत्यंत दोहा छेत्र में प्राप्त होती है

कुछ सखिया चोपाई, उल्लास, हरिपद, गीता, सार छाप्या छंद में भी प्राप्त होती है उन्होंने अपनी सखियों में संसार के मित्यातव का, ब्रम्हा और माया के प्रपंच का खुलकर चित्रण किया है

साहित्य विशेषताओ के बारे में

कबीर के साहित्य की विशेषताए है – निर्गुण भक्ति, गुरु-महिमा, नाम-महिमा, ब्रम्हांडंबरो का विरोध, मानवतावाद एवं रहस्यवाद |

निर्गुण भक्ति

कबीर दास जी की साहित्य में स्थान है. कबीर वास्तव में एक भक्त है कवि बाद में है वह निर्गुण भक्ति मार्ग के अनुयायी है उन्होंने ब्रम्हा को निर्गुण कहा है. यघपि उस परमात्मा के अनेक नाम है तथापि वह एक, अलक, अगोचर और अगम्य है वह पुष्प की सुगंध से भी सूक्ष्म है

गुरु महिमा

कबीर ने गुरु को अत्यधिक महत्व दिया है उनके लिए गुरु गोबिंद से बढ़कर है कबीर ने गुरु को सतगुरु कहकर सम्बोधित किया है तथा उनकी महिमा को अत्यंत बतलाया है सतगुरु अत्यंत उपकार करने वाला तथा अत्यंत दृष्टि प्रदान करने वाला होता है गुरु की उस असीम, अनंत ब्रामण का साक्षात्कार करने वाला होता है

नाम महिमा

कबीर की निर्गुण भक्ति में सर्वाधिक महत्व नाम सिमरन का है इन्होने परमात्मा से बढ़कर परमात्मा के नाम का सिमरन बतलाया है इस वे नाम को ही ब्रह्मा कहते है नाम समरण यदि वह मन से हो तभी वह नाम सिमरन है यदि माला फेरते रहे और मन भटकता रहे तो वह नाम सिमरन नहीं है

ब्रह्माडंबरो का विरोध

कबीर ने समाज और धर्म सम्प्रदायो में प्रचलित ब्रह्माडंबरो का खुलकर विरोध किया | उन्होंने मूर्तिपूजा, तीर्थाटन, व्रत -उपवास और ब्रह्माडंबरो पर व्यंग प्रहार किया है वह कहते है-

उन्होंने हिन्दू, मुश्लिम दोनों के ब्रह्मचारो का खंडन किया है हिन्दुओं की मूर्ति पूजा की विषयो में उन्होंने कहा है-

मुसलमानो की भत्सर्ना करते हुए वह कहते है-

इस प्रकार उनका साहित्य खंडनात्मक प्रवृतियों से युक्त सामाजिक कुरीतियों पर कुठारघात करता है |

मानवतावाद

कबीर ना ही हिन्दू थे और ना ही मुसलमान | वह विशुद्ध मानव थे उन्होंने समाज में व्याप्त वैषम्य का सदैव विरोध किया उन्होंने मानव मात्र का हित करने का सर्वदा प्रयास किया उन्होंने परोपकार, सेवा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा जैसे गुणों को धारण करने पर बल दिया उन्होंने मनुष्य के सुधाचरण को महत्व दिया उन्होंने मानव मात्र के मध्य की दूरियों को कम करने का साहित्य प्रयास किया इसलिए उन्हे समाज सुधारक के रूप में भी देखा जाता है

रहस्यवाद

कबीर का अध्यन करने से ज्ञात करने ज्ञात होता है कि उनमें रहसयवाद की प्रवृति थी रह्स्य्वाद में अज्ञात सत्ता के प्रति जिज्ञासा, उनका महत्व, उनका आभास और उनसे मिलने की अनुभूतियों का समावेश रहता है कबीर ने रहस्य की इन सभी स्थितियों का सजीव चित्रण अपने काव्य में किया है

भाषा (कबीर दास जी की भाषा शैली?)

कबीर की काव्य भाषा की विशेषता? कबीर के साहित्य में प्रयूक्त भाषा मिस्रित भाषा है उनकी भाषा में अनेक बोलियों के शब्दो का मिश्रण है अतः उनकी भाषा को ‘सधुककडी’ भाषा भी कहा जाता है उसमें बंगला, बिहारी, मेथाली, भोजपुरी, अवधी, ब्रज, खड़ीबोली, राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, सिंधी, लहन्दा, अरबी, फारसी, आदि सभी बोलियों का समावेश है. उनकी भाषा ओजपूर्ण और भवनुगामिनी है.

कबीर दास जी के दोहे का अर्थ

कबीर के जीवन एवं मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए

कबीरदास की सामाजिक चेतना

निर्गुण भक्ति काव्य धारा के सर्व प्रमुख कवि महात्मा कबीर दास न केवल कवि थे अपितु वह संत, भक्त और समाज सुधारक भी थे. समाज में व्याप्त बाहरी आडंबरो, प्रचलित कुर्तियों और अव्यवस्था के प्रति उनके मन में आक्रोश था और वह उनके विरुद्ध खुलकर बोलते थे. कबीर वस्तुतः समाजचेता कवि थे 

कबीर के समय में उत्तरी भारत में हिंदू और मुसलमान परस्पर द्वेस रखते थे. पंडित और मुन्ना दोनों अपने अपने मतों को सर्वोपरि बताते थे. विचारों की संकीर्णता से ग्रस्त  मनुष्य बाहरी आडंबरो पुराने कुर्तियों से  जकड़े हुए थे. ऐसे समय में कबीर एक क्रांतिकारी समाज सुधारक के रूप में सामने आए और अपने काव्य के माध्यम से हिंदू, मुसलमान, सामाजिक अवस्था, पाखंड, द्वेस, जड़ता सभी के विरुद्ध खुलकर बोले। उन्होंने सामान्यतया  प्रवृत्ति अपनाई तथा मानवता का संदेश दिया

उन्होंने जाति और संप्रदाय मैं ऊपर उठकर मानव को मानवता का पाठ पढ़ाया। समाज में जाति और संप्रदाय की कटता द्वेष बढ़ाती है तथा समाज में अस्वस्थ और समाज तोड़ने वाली विचारधारा का प्रचार करती है.

कबीर की भक्ति की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए?

कबीर निर्गुण भक्ति धारा के अनुयाई थे. वास्तव में वह एक संत थे. वह किसी विशेष मत के प्रभाव में नहीं थे. उन्होंने सभी मत एवं धर्म की कुरीतियों का विरोध कर सहज रूप से एक निर्गुण परमात्मा की भक्ति पर बल दिया। उनकी भक्ति में आचरण की शुद्धता, नाम- महिमा, समरण पर बल, प्रभु के प्रति अनन्यता, गुरु महिमा घट घट व्यापी निर्गुण ब्रह्म एवं नैतिकता पर बल दिया गया है

कबीर ने भक्ति मैं घर छोड़कर वन गमन की आवश्यकता नहीं बतलाई है, अपितु इसके विपरीत समाज में रखे हुए अपने आश्रित जनों के प्रति कर्तव्य निर्वाह करते हुए भगवान की ओर उन्मुख होने पर बल दिया है उन्होंने सद्गृहस्थ रहते हुए शुद्ध आजीविका अर्जन करते हुए प्रभु नाम स्मरण की प्रेरणा दी है

कबीर निर्गुण राम के उपासक थे. उनके राम निर्गुण, घट घट व्यापी, अंतर्यामी और एक है. उन्होंने मूर्ति पूजा और अवतारवाद का विरोध किया है. उनका प्रभु सर्वव्यापी, निराकार, अगोचर है. वह मन और वाणी से अगम्य है. राम और अल्लाह सभी में एक ईश्वर है. वह घट-घट व्यापी है

कबीर दास की अन्य रचनाएं

मन ना रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा – कबीर भजो रे भैया राम गोविंद हरी – कबीर
का लै जैबौ, ससुर घर ऐबौ – कबीरसुपने में सांइ मिले – कबीर
मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै – कबीरतूने रात गँवायी सोय के दिवस गँवाया खाय के – कबीर
मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै – कबीरसाध-असाध का अंग – कबीर
दिवाने मन, भजन बिना दुख पैहौ – कबीरमाया महा ठगनी हम जानी – कबीर
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो – कबीररस का अंग – कबीर
संगति का अंग – कबीरझीनी झीनी बीनी चदरिया – कबीर
रहना नहिं देस बिराना है – कबीरसाधो ये मुरदों का गांव – कबीर
विरह का अंग – कबीररे दिल गाफिल गफलत मत कर – कबीर
सुमिरण का अंग – कबीरमन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में – कबीर
राम बिनु तन को ताप न जाई – कबीरतेरा मेरा मनुवां – कबीर
भ्रम-बिधोंसवा का अंग – कबीरसाध का अंग – कबीर
घूँघट के पट – कबीरहमन है इश्क मस्ताना – कबीर
सांच का अंग – कबीरसूरातन का अंग – कबीर
हमन है इश्क मस्ताना – कबीररहना नहिं देस बिराना है – कबीर
मेरी चुनरी में परिगयो दाग पिया – कबीरकबीर की साखियाँ – कबीर
मुनियाँ पिंजड़ेवाली ना, तेरो सतगुरु है बेपारी – कबीरअँधियरवा में ठाढ़ गोरी का करलू – कबीर
अंखियां तो छाई परी – कबीरऋतु फागुन नियरानी हो – कबीर
घूँघट के पट – कबीरकरम गति टारै नाहिं टरी – कबीर

कबीर दास का जीवन परिचय वीडियो

कबीर दास की जीवनी हिंदी में

यह भी पढ़े

Kabir Das ka Jivan Parichay से रिलेटेड कुछ प्रश्न (FAQ’s)

Q: कबीर दास जी की प्रमुख रचना कौन सी है?

 Ans: बीजक

Q: कबीर साहेब से भेंट किसकी रचना है?

Ans: रामधारी सिंह दिनकर

Q: कबीर दास की रचनाओं का संग्रह किस नाम से प्रकाशित है?

Ans: कबीर ग्रंथावली

Q: कबीर दास जी की भाषा शैली?

Ans: सधुक्कड़ी 

Q: कबीर किस भाषा का शब्द है?

Ans: इस्लाम 

Q: कबीर के काव्य की भाषा क्या कहलाती है?

 Ans: सधुक्कड़ी भाषा

अंतिम तथ्य

आशा करता हूँ कि आपको इस पोस्ट Kabir Das ka Jivan Parichay से कबीर दास के बारे में पता चल गया होगा कि उनका चित्रण कैसा था. ऐसी रोचक जानकारी पाने के लिए हमें अभी सब्सक्राइब करें

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