वर्ण व्यवस्था क्या है | Varn Vyavastha Kya Hai

वर्ण व्यवस्था का अर्थ एवं महत्व: आज हम बात करने वाले है वर्ण व्यवस्था के बारे में की वर्ण व्यवस्था क्या है, वर्ण व्यवस्था किसे कहते है, वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति कैसे हुई और यह कितने प्रकार की थी

भूमिका (Introduction)

इसमें कोई संदेह नहीं है कि विश्व के सभी समाजों में  व्यवस्था के अनुकूल वर्गों का उदय होना शुरू हो गया था| वर्ण व्यवस्था ने भारतीय समाज का स्पष्ट रूप से विभाजन कर दिया और इसी व्यवस्था से जाति प्रथा  की उत्पत्ति हुई. वर्ण व्यवस्था तथा जाति प्रथा ने भारतीय समाज में सामाजिक संबंधों को स्वरूप प्रदान करने का कार्य किया जिससे विवाह प्रणाली का उदय हुआ

उद्देश्य (Objective)

सभ्यता के उदय के साथ-साथ भारतीय समाज में वर्ण, जाति प्रथा, विवाह तथा संपत्ति संबंधी संस्थानों का जन्म हुआ. भारतीय समाज को समझने के लिए उन संस्थानों का अध्ययन आवश्यक है. इस अध्याय को पढ़ने का मुख्य उद्देश्य इन संस्थानों को जाना है

प्रस्तुतीकरण (Presentation)

1. वर्ण व्यवस्था

वह एक सामाजिक व्यवस्था है. प्रारंभ मैं वर्ण का प्रयोग संवत रंग के संदर्भ हुआ. आर्य जो रंग के गोरे थे, इस भेद को स्पष्ट करने के लिए वर्ण का प्रयोग किया गया. एक साधारण व्यक्ति के लिए वर्ण का अभिप्राय इस प्रकार से हैं-

  • सफेद रंग से ब्राह्मण
  • लाल रंग से क्षत्रिय
  • पीले रंग से वैश्य
  • काले रंग से शूद्र

प्राचीन समय से ही प्राय सभी देशों में समान हितों और व्यवसाय के आधार पर समाज बटा हुआ था. ईरान के समाज में 4 वर्ग- पुरोहित, योद्धा, कुलपति, शिल्पी थे. इसी प्रकार चीन के समाज में शिक्षित, किसान, भारत में शिल्पी और व्यापारी वर्ग थे. भारत में वर्ण व्यवस्था का ज्ञान हमें हड़प्पा से है, जिसमें पुरोहित, व्यापारी, किसान, कारीगर विद्यमान थे

चलिए वर्ण व्यवस्था के प्रकार के बारे में जानते है

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2. ऋग्वेदिक काल में वर्ण व्यवस्था

स्पष्ट रूप से वर्ण व्यवस्था ऋग्वेद की पहचान हमें ऋग्वेदिक काल से होती है. समाज में मुख्य रूप से दो समूह से एक आर्य, दूसरे अनार्य। आर्य के गोरे थे और अनार्य रंग के काले थे. दसवें मंडल के पुरुष सूक्त की एक त्रिचा में कहा गया है, जिसका अर्थ है मैं कभी मेरा किताब है तथा मेरी मां पत्थर पर अनाज पीसने वाली है.

इससे स्पष्ट होता है कि सभी अलग-अलग कामों पर लगे हुए थे, लेकिन धीरे-धीरे समाज में 4 वर्ग स्थापित हो गए.- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्या और शूद्र जैसे ऋग्वेद के दसवें मंडल में पुरुष सूक्त से ही पता चलता है। 

इसे सूक्त में कहा गया है कि ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वेश्या और पैरों से शुद्र की उत्पत्ति हुई, परंतु इन वर्णों का विभाजन जन्म अनुसार नहीं था

उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था

ऋग्वेदिक काल में वर्ण व्यवस्था की पहचान स्पष्ट हो चुकी थी, परंतु वह व्यवस्था कर्म के आधार पर थी. उत्तर वैदिक काल में चारों वर्णों के कर्तव्यों का विभाजन हो गया तथा समाज में उनके स्थान  का भी निर्धारण हो गया

वर्ण व्यवस्था का दोष

  • ब्राह्मण- वर्ण व्यवस्था में सर्वश्रेष्ठ स्थान ब्राह्मणों को प्राप्त हुआ. इसका में इनका महत्व काफी बढ़ गया. ब्राह्मण का कार्य धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ करना, और शिक्षा प्रदान करना था. यह भू-देवता के रूप में उभर कर सामने आए. यज्ञ मेंब्राह्मणों की अनिवार्यता को स्वीकार आ गया
  • क्षत्रिय- इस वर्ग में प्रमुख रूप से राजा के संबंधी,  शाही वर्ग, सैनिक। कबीलों के  मुखिया आदि सम्मिलित हैं. राज्य की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा करना इसका कर्तव्य था. क्षत्रिय तप के माध्यम से ब्रह्मांडतप को भी प्राप्त कर सकते हैं
  • वेश्या- समाज में इनका स्थान ब्राह्मण और क्षत्रिय निम्न था. इनमें कृषि पशुपालन व्यापार उद्योग आदि से जुड़े लोग सम्मिलित थे.
  • शूद्र- समाज में श्रमिक वर्ग या अनार्य इस वर्ग में आते थे. इनका कार्य अन्य वर्गों की सेवा करना था. समाज में इन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध थे.

वेदोत्तर काल में वर्ण व्यवस्था

समाज में वर्ण व्यवस्था धीरे-धीरे जन्म के आधार पर चलने लगी. ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय का पुत्र क्षत्रिय, वेश्या का पुत्र वेश्या और शुद्र का पुत्र शुद्र स्वीकार किया गया. ब्राह्मण तथा क्षत्रिय में सर्वोचता प्राप्ति के लिए संघर्ष चल रहा था.

बुद्ध एवं जैन ग्रंथों में ब्राह्मण के स्थान पर क्षत्रिय को प्रथम स्थान प्रदान किया गया, क्योंकि इन दोनों धर्मों में परिवर्तित  क्षत्रिय थे. इस प्रकार वर्ण व्यवस्था से समाज में धीरे-धीरे जाति प्रथा की उत्पत्ति हुई

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FAQ’s

Q: वर्ण व्यवस्था कब शुरू हुई?

Ans: वर्ण व्यवस्था के उद्भव महाभारत में भी किया गया है

Q: चार वर्ण कौन से हैं?

Ans: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र

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