वैदिक संस्कृति (Vedie Culture) क्या है भूमिका और उद्देस्य

भूमिका (Introduction)

आज हम बात करने जा रहे है इतिहास में प्रचलित महान वैदिक सभ्यता के बड़े में कि वैदिक संस्कृति (Vedie Culture) क्या है इसकी भूमिका और उद्देस्य क्या थे.सिन्दु घाटी के अवसान के बाद जो नई सभ्यता भारत में प्रचलित हुई, वैदिक सभ्यता नाम से जाना जाता है. इस सभ्यता को वैदिक सभ्यता इसलिए भी कहते है, ,क्यौंकि इसका वर्णन वैदिक साहित्य से प्राप्त होता है. इस सभ्यता की निर्माता आर्य थे

इनकी जाति और आदम स्थान इतिहास का एक अत्यंत विवादस्पद विस्य है. इसका समाधान अभी तक नहीं हो सका है. विद्वानों ने इस सम्बन्ध में अधिक सिद्धांत स्थिर किये है

वैदिक संस्कृति (Vedie Culture) क्या है
वैदिक संस्कृति (Vedie Culture) क्या है

प्राय यह माना जाता है कि आर्य विदेशी थे और उत्तर-पश्चिमी की तरफ से उन्होंने भारत में प्रवेश किया था. उत्तर भारत में उस समय बसने वाली अनेक जातियों से उन्होंने परवेश किया, उन्हें पराजित कर उत्तर भारत में अपना शासन स्थापित किया

वहां की जातियों को वे ‘अनार्य’ और अपने को ‘आर्य’ कहते थे. इस संघर्ष का वर्णन वेदो से प्राप्त होता है

उद्देश्य (Objective)

वैदिक काल में भारतीय समाज विलास के दौर से गुजरा। वैदिक काल के बाद इतिहास और वर्तमान भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को सही रूप से जानने के लिए इस सभ्यता को पढ़ना इतिहास के विद्याथियो के लिए अति अनिवार्य है

प्रस्तुतिकरण (Presentation)

आर्यों के आदि देश के संबंद मे विद्वानों के विभिन्न मत निम्न है-

  • आर्यों का मूल निवास स्थान
  • आर्यों का आदि देश यूरोप

भाषा और संस्कृति की समानता तथा मानव जाती के सम्बन्ध में कई लोगो के आधार पर कुछ विद्वानों ने आर्यों का आदि देश यूरोप माना है. फ्लोरेंस के एक सौदागर फिलिप्पो सेसेटी ने, जो सोलवीं शताब्दी के अंत में भारत आया था, पहली बार संस्कृत और यूरोप के बीच समानता। की ओर विद्वानों का धयान आकर्षित किया

इसके अंततर 1786 ने सर विलियम जोन्स ने बंगाल के एशियाटिक सोसायटी के सम्मुख पढ़े गये अपने लेख में यह बताना है कि भाषाओ की समानता का कारण है, भारत और यूरोप के लोगो का एक ही मूल स्थान में रहना।

उन्होंने संस्कृत, ईरानी और यूरोप की बहुत सी भाषाओ के बीच सामान शब्दो के बीच लोगो का ध्यान दिलाया। उदहारण के लिए पित्त, पिदर, पेटर, फादर, मादर और मदर जैसे शब्द उद्यत किये जा सकते है

जोन्स ने यह भी विचार प्रस्तुत किया है कि प्राचीन काल में कोई ऐसा ही समय रहा होगा, जब इन विभिन भाषाओ के पूर्वज एक ही स्थान पर एक साथ रहे हो और बाद में भौतिक आव्सकताओ के कारण उन्हें अलग होना पढ़ा हो

ऐसे में सिद्धांतों को मानने वाले गर्ल्स महोदय हैं जिन्होंने भाषाओं के आधार पर यह विचार व्यक्त किया है की indo-european जातियों को किन-किन पशुओं और वृक्षों का ज्ञान था  जानते हैं कि आर्यों का मूल स्थान पर्वतों और जल के कारण अन्य स्थानों से अलग रहा होगा।

यह गेहूं और जौ का प्रयोग करते होंगे उनके पालतू पशुओं में गाय, भैंस, घोड़ा, कुत्ता और सूअर की प्रधानता रही होगी ऐसा प्रदेश गाइड्स महोदय ने हंगरी के मैदानों को बताया है और उसके मत मैं आर्यों का आदि निवास स्थान है कुछ दूसरे विद्वानों एशिया ने यह क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया मध्य और पश्चिमी जर्मनी बोहेमिया अथवा किशन सागर के विस्तृत उत्तर मैदानों को दिया है

माइनर के बोगज कोई नामक स्थान में  1400 ईसवी पूर्व का एक अभिलेख लिखा मिला है जिसमें मित्र वरुण इंद्र आदि वैदिक देवताओं का उल्लेख किया गया है इसके साथ ही पश्चिमी एशिया में तत्कालीन राजाओं के नाम भी मिलते हैं जो इंडोर ईरानी नामों के समान है

इस आधार पर इन विद्वानों ने यह मत स्थिर किया है कि आर्य लोग यूरोप में एशिया माइनर सीरिया और ईरान आदि देशों से होते हुए भारत पहुंचे, परंतु इसके विपरीत कुछ विद्वानों का मना किया है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और यही ईरान, सीरिया और एशिया माइनर होते हुए भी यूरोप गए

आर्यों का मूल-देश मध्य एशिया

प्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्स मूलर के ने आर्यों का आदि देश मध्य ऐसे माना है कुछ विद्वान उसे पामीर प्रदेश में तथा कुछ रूसी तुर्किस्तान में स्थिर करते हैं. लेकिन मध्य एशिया के मत का ही अधिकतर विद्वान ने समर्थन किया इसका आधार आर्यों के आदि ग्रंथ वेद और रानियों के आदि ग्रंथ अवस्था का तुलनात्मक अध्ययन है

इन दोनों साहित्यों में वर्णित संस्कृति की समानता के आधार पर विद्वानों का विचार है कि आर्यों का आदि देश भारत और ईरान के समीप ही कहीं रहा होगा। प्राचीन आर्य कृषि और पशुपालन करते थे. उनके वर्ष की गणना हिम से आरंभ होती थी. इसी तरह की अन्य बातों पर विचार करते हुए इस मत के विद्वानों ने मध्य एशिया को आर्यों का मूल स्थान माना है यहीं पर आने दो शाखाओं में विभक्त हुए तथा ईरान और यूरोप की ओर चले गए ईरान से ही कुछ कमी ने भारत आए. मध्य एशिया से दक्षिण पश्चिम और पश्चिम की ओर जातियों का भ्रमण सुगमता पूर्वक हो सकता है आर्थिक कारणों से को अपने स्थान का त्याग करना पड़ा

 यह कहना कठिन है  मध्य एशिया आज का अभाव है और नहीं है संभव है कि मध्य प्रदेश प्राचीन समय में हो रहा होगा और भौगोलिक परिवर्तनों के कारण वर्तमान स्थिति बनी हो

आर्यों का आदिदेश-आकर्टिक प्रदेश

लोकमान्य तिलक में आर्यों का आदि देश उत्तरी ध्रुव प्रदेश निश्चित किया है उनके कथा अनुसार आर्यों को इस बात की जानकारी थी कि एक लंबे दिन और लंबी रात का 1 वर्ष होता है और कई दिनों का प्रातकाल होता है जो इस प्रदेश की विशेषताएं हैं.

उन्होंने इस उन्होंने इसे अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा है कि पहले उत्तरी ध्रुव का प्रदेश बर्फ से ढका हुआ था परंतु भौगोलिक कारणों से कालांतर में यह स्थिति बदली और वहां का मौसम अच्छा हो गया. इन्ही परिस्थितियों में यह आर्यों का निवास रहा. इस बार पुनः वहां पर 8000 ईसवी पूर्व में हिमपात हुआ आर्यों को यह प्रदेश छोड़ना पड़ा। यह लोग के पूर्व में मध्य एशिया में आकर बस गए और वहीं से ईरान और भारत आये 

आर्यों का आदिदेश-भारतवर्ष

एक अन्य मत यह भी है कि आर्य भारत के निवासी थे, और यहीं से वे भारत के बाहर अनेक देशों में गए. भारत में ही विभिन्न देवी-देवताओं प्रदेशों को इस मत के समर्थकों ने आर्यों का मूल स्थान माना है अविनाश चंद्र दास इसे सप्तसिंधु प्रदेश गंगा नाथ का ग्राम सिदेश ब्रह्मर्षि देश तथा त्रवेद मुल्तान के समीप देविका नदी का प्रदेश मानते हैं श्री कल्ला कश्मीर और हिमाचल प्रदेश को यह श्रेय हैं. कुछ विद्वान पुराणिक आधार पर मध्य देश को यह गौरव प्रदान करते हैं इसे विद्वानों की यह धारणाएं निम्न तर्कों पर आधारित है-

  1. अभी तक आर्यों के विदेशी होने के संबंध में निश्चित प्रमाण नहीं दिया जा सका है. प्राचीन परंपराओं में उनके बाहर से आने के संकेत नहीं हैं. साहित्य में सप्त सिंधु प्रदेश की विशेष चर्चा आती है जिसे देवताओं द्वारा निर्मित कहा गया है इसलिए इस प्रदेश को इस का आदि देश माना माना उचित है
  2. वैदिक संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं की समानता के आधार पर आर्यों को विदेशी नहीं माना जा सकता है. आर्य परिवार की भाषाओं में संस्कृत के शब्दों की संख्या सबसे अधिक तथा यूरोपीय भाषाओं में बहुत कम है यह स्पष्ट करना बहुत कठिन है कि शब्दों की संख्या अपने मूल स्थान से कम और भारत में यही वह दूर का देश है। जो तो अधिक क्यों नहीं इस समस्या का समाधान तभी हो सकता है जब हम यह मानें कि आर्य भारत के निवासी थे. यहीं से दुनिया के दूसरे देशों में फैल गए. इसलिए संस्कृत के शब्दों की संख्या अधिक भाषाओं में कम दिखाई देती है
  3. वैदिक साहित्य आर्यों की महत्वपूर्ण देन है अगर हम यह मान कर चलें कि विदेशी थे तो सब सिंधु प्रदेश प्रदेशों में आने से पहले उनके साहित्य का प्रमाण अन्य देशों में क्यों नहीं उपलब्ध होता? इसका उत्तर यही नहीं किया नहीं हो सकता कि भारत में आने के बाद ही उनकी सभ्यता विकसित हुई है और उन्होंने साहित्य की रचना की, दूसरी तरफ यह मानना अति युक्तिसंगत है कि आर्य भारत के निवासी थे और यहीं से वह भारत से भाग गए. जो बाहर दूसरे देशों में गए थे. वहां के परिवार से कम सभ्य और सुसंस्कृत रहे होंगे और इसलिए बाहर के देशों में आर्य सभ्यता के प्रमाण कम मिलते हैं
  4. कुछ विद्वान तर्क देते हैं कि ऋग्वेद के बाघ (Tiger ) का वर्णन नहीं मिलता। परंतु सिंह का उल्लेख आता है यह भी कहा गया है कि हाथी के लिए ‘’मृगहस्तिन’’ इस शब्द के प्रयोग से यह संकेत मिलता है कि यहपशु आर्यों के लिए नया ही था. हड़प्पा में मिली मोहरों से यह स्पष्ट हो जाता है कि पंजाब के लोगों को बाघों, हाथियों का परिचय अच्छी तरह का था. यह भी संभव नहीं कि हड़प्पा काल की संस्कृति में पंजाब में जिन पशुओं का अस्तित्व था वह उसके बाद के काल में समाप्त हो गए हो और इसीलिए उनका वर्णन ऋग्वेद में नहीं मिलता। मृगहस्तिन यह कवि कि कोई विशेष कल्पना हो सकती है. ऋग्वेद में बहुत सी चीजों का वर्णन नहीं है. उनके आधार पर अगर हम या निष्कर्ष निकाले कि यह सभी चीजें आर्य को अज्ञात थी तो यह उचित नहीं होगा। ऋग्वेद में नमक का उल्लेख नहीं है इससे अगर हम अनुमान करें कि हर वस्तु उन्हें ज्ञात नहीं थी तो यह उपरोक्त नहीं होगा
  5. ऋग्वेद की भौगोलिक स्थिति के सूक्ष्म अध्ययन से प्रतीत होता है कि ऋग्वेद के मंत्रों की रचना करने वाले आर्यों का मूल स्थान पंजाब और उसके आसपास ही कहे रहा होगा

भारत को आर्यों का आदि देश मानने वालों के मतों का भी खंडन हुआ है. संपूर्ण दक्षिण भारत और उत्तरी भारत के कुछ देशों कुछ भागों में आर्य भाषाओं का प्रयोग ना होना और विशेषकर बहूही बोली जो द्रविड़ परिवार से हैं का बिलोचिस्तान में अस्तित्व इस बात का घोतक है कि भारत के विस्तृत भू-भाग में कमी अनार्य भाषाओं राजनीति किस्मत को मानने में कठिनाइयां भी है कि हिंदू सभ्यता की लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा चुकी जा चुकी है

यदि यह सिद्ध हो जाये कि  वहां की भाषा का संबंध संस्कृत से है तो यह माना जा सकता है कि आर्य यही के मूल निवासी थे. इस परस्पर विरोधी सिद्धांतों के बीच साहित्य भाषा विज्ञान के आधार पर किसी एक पक्ष में निर्णय करना संभव नहीं, आर्यों का आदि देश की समस्या पूरा तत्वों के आधार पर ही हल हो सकती है

अभी तक हुए अनुसंधान के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि आप हिंदू सभ्यता की अंतिम चरण में ही भारत आए और उनका स्थान भारत के बाद ही था. वैदिक साहित्य के अध्ययन से इतना अवश्य ज्ञात होता है कि आर्यों का भारत से विस्तार का क्रम पश्चिम से पूर्व की ओर| यह बात भी इस समस्या के समाधान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि आधुनिक इतिहास पर मैक्स मूलर मध्य एशिया सिद्धांत को तर्कसंगत मानते हैं

आर्यों का भारत में प्रवेश कब हुआ यह भी विचारणीय प्रश्न है महात्मा बुद्ध के जन्म से पहले वैदिक साहित्य की रचना हो चुकी थी विशाल वैदिक साहित्य के सृजन में कम से कम एक सहसत्र वर्ष लगे होंगे

इस आधार पर यह मानना उचित है कि दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व में फिर बाद में किसी समय आर्य भारत में आए होंगे, वह यह समय था जब बेबीलोनिया में कसाइट, एशिया माइनर, यूनान में जनजातियों का प्रवेश हुआ था. इसी युग में सिंधु घाटी की सभ्यता भी अपने पतन के अंतिम चरणों में थी 

इसलिए यह संभव लगता है कि इस सभ्यता के विनाश के आगे का आक्रमण भी प्रमुख कारण रहा होगा। श्री बीवी लाल महोदय ने भारत में आने वाले प्रारम्भिक आर्यों का चित्रित सलेटी पात्र (Painted Grey Ware) संस्कृति का निर्माता माना है 

आज अपने क्या सीखा

आपको हमारी यह जानकारी वैदिक संस्कृति (Vedie Culture) क्या है कैसी लगी और इससे रिलेटेड आपका कोई सवाल या सुझाव है तो हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताये

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